जिन्ह हरि कथा सुनी नहिं काना। श्रवन रंध्र अहिभवन समाना ||
जिन लोगों ने हरि कथा नहीं सुनी उनके कान सांप के बिल (बांबियों ) के समान हैं | गोस्वामी तुलसीदास की इन पंक्तियों से उत्तम और क्या शुरुआत हो सकती थी इस ब्लोग की |
यह चिठ्ठा एक माध्यम रहेगा सत्संग करने का | अपने पवित्र ग्रंथों , धर्म , जीवन और दर्शन पर चर्चा करने का | यह प्रथम प्रविष्टि है इसलिये छोटी है | पर यहाँ नियमित आते रहियेगा | इसपर हमारे नियमित चिठ्ठाकार राजेश आनन्द तो रहेंगे ही , अन्य भक्तों से भी विनय है की वो भक्ति और ज्ञान की चर्चा मे शामिल हों |
मेरा स्थान और ज्ञान दोनो ही संकुचित हैं , इसलिये मेरा योगदान चिठ्ठे के परिचालन को नियमित रखना एवं थोडी -बहुत तकनीकी सहायताप्रदान करने तक ही सीमित रहेगा |
15 June 2007
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